जयपुर की हसीन रातें-2
अन्या की मुस्कान मेरी गर्दन के पास ठहरी हुई थी जब उसने धीरे से कहा, “हमारे लिए इससे भी कहीं ज़्यादा छिपा है, मेरे राजकुमार…” उसका हाथ मेरे सीने पर था, जैसे वह मुझे अपनी ओर और करीब बुला रही हो। मैंने उसकी खुली पीठ पर अपनी उंगलियाँ धीरे-धीरे फेरीं। रेशमी कपड़ा उसकी मुलायम त्वचा पर ऐसे फिसल रहा था, मानो किसी पुराने शाही महल की पोशाक धीरे-धीरे खुल रही हो। अपनी राजकुमारी वाली भूमिका में डूबी अन्या ने धीमे लेकिन आदेश भरे स्वर में कहा, “मेरे राजकुमार… मेरी गर्दन पर ऐसे चुंबन दो, जैसे हम किसी भूले हुए महल में छिपकर मिल रहे हों।” मैंने उसकी लंबी और नर्म गर्दन पर अपने होंठ रख दिए। उसकी खुशबू में एक अजीब-सी मिठास थी, जिसने मुझे पूरी तरह अपने एहसासों में डुबो दिया। उसकी नीली आँखें लगातार मुझे देख रही थीं, जैसे वह सच में कोई रहस्यमयी राजकुमारी हो जो अपने राज़ सिर्फ मेरे साथ बाँटना चाहती हो। उसकी साँसें धीरे-धीरे तेज़ होने लगीं। वह करीब आकर मेरे ऊपर झुक गई और अपनी टांगों को मेरी कमर के चारों ओर लपेट लिया। उसकी आँखों में एक साथ नर्मी और चाहत दोनों झलक रही थीं। हम दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे को महसू...